हाल ही में रिलीज़ हुई इस फिल्म को इंडियन सिनेमा की अब तक की सबसे महंगी कोर्टरूम ड्रामा कहा जा रहा है। यह फिल्म एक एडल्ट रेटेड, हाई-बजट प्रोजेक्ट है जो भारतीय इतिहास के सबसे काले अध्याय को स्क्रीन पर उतारने की कोशिश करती है। सवाल ये उठता है कि क्या इतने हाई बजट में बनी ये फिल्म दर्शकों को प्रभावित कर पाई है? आइए बात करते हैं फिल्म के बारे में विस्तार से
फिल्म की शुरुआत: एक झकझोर देने वाला इंट्रो
फिल्म की शुरुआत होती है जलियांवाला बाग नरसंहार से। हां, वही भयावह और दिल दहला देने वाला घटनाक्रम जिसे हम कई बार पर्दे पर देख चुके हैं, लेकिन इस बार स्क्रीन पर जो देखा, वो अब तक का सबसे असरदार प्रस्तुतीकरण था। इस सीन को देखकर शरीर में सिरहन दौड़ जाती है—खून खौल उठता है।
इस पूरी ओपनिंग सीक्वेंस में जिस तरह से वॉइस ओवर और डायरेक्शन का इस्तेमाल किया गया है, वह दर्शकों को सीधे अतीत में ले जाता है। ये सीन फिल्म का टोन सेट करता है—गंभीर, भावनात्मक और विद्रोह से भरा।
अक्षय कुमार की एंट्री: जस्टिस की आवाज़
इसके तुरंत बाद फिल्म में अक्षय कुमार की एंट्री होती है, और यहीं से कहानी कोर्टरूम ड्रामा की दिशा में मोड़ लेती है। अक्षय ने एक बार फिर साबित कर दिया कि चाहे उनकी फिल्मों की फ्रीक्वेंसी जितनी भी हो, पर जब परफॉर्मेंस देने की बात आती है, वो कभी पीछे नहीं रहते।
हालांकि, उनके करियर की हालिया लाइनअप को देखकर ऐसा लगता है कि जैसे वो मशीनगन मोड में हैं—हर महीने एक फिल्म! लेकिन इस बार वो एक ज़ोरदार पंच के साथ आए हैं। खासकर फिल्म के अंत में जिस अंदाज़ में उन्होंने अपनी परफॉर्मेंस दी है, वो उन्हें वापस उस मुकाम की तरफ ले जाती है जहाँ से उन्होंने शुरुआत की थी।
ब्रूटैलिटी और एफ-वर्ड्स: क्यों है ये फिल्म एडल्ट?
फिल्म को 'ए' सर्टिफिकेट केवल उसकी हिंसा या कोर्टरूम भाषा की वजह से नहीं मिला है। खासकर क्लाइमैक्स में F-word का जो इस्तेमाल हुआ है, वह एक सशक्त इमोशनल और पॉलिटिकल स्टेटमेंट बनकर सामने आता है। अक्षय कुमार का वो संवाद आपको मजबूर कर देगा ज़ोर से कहने के लिए—"F* the British!"**
कमज़ोर कड़ी: अनन्या पांडे और सेकंड हाफ
अब आते हैं फिल्म की सबसे बड़ी कमजोरी पर—अनन्या पांडे। जहां एक तरफ आर. माधवन और अक्षय कुमार अपने करियर की पराकाष्ठा पर पहुंचते नज़र आते हैं, वहीं अनन्या पांडे का परफॉर्मेंस फिल्म के टेम्पो को कई बार गिरा देता है।
उनकी परफॉर्मेंस किसी इलायची की तरह है जो बिरयानी में आ जाए—मूड खराब कर देती है। ये नहीं कहा जा सकता कि उन्होंने घटिया एक्टिंग की है, लेकिन बाकियों के स्तर की तुलना में उनका योगदान हल्का लगता है।
आर. माधवन: एक ग्रे कैरेक्टर की चमक
आर. माधवन एक टॉप क्लास एडवोकेट की भूमिका में हैं, लेकिन उनकी कहानी का जो बिल्डअप फिल्म करती है, उसे अंत में लगभग नज़रअंदाज़ कर देती है। फिर भी, माधवन अपने अभिनय के दम पर अपनी छाप छोड़ने में कामयाब होते हैं—खासतौर पर पहले हाफ में।
संगीत और क्लाइमेक्स: गूजबम्प्स ऑन पॉइंट
फिल्म में गानों की संख्या बहुत कम है, लेकिन जो भी हैं, वे पूरी तरह से सिचुएशन में फिट बैठते हैं। खासतौर पर जब "तेरी मिट्टी" बैकग्राउंड में बजता है, तब गूजबम्प्स आना लाजमी है। फिल्म में ऐसे तीन-चार गूजबम्प मोमेंट्स हैं जो इसे एक परफेक्ट थिएटर एक्सपीरियंस बनाते हैं।
डायरेक्शन और रिसर्च: डेब्यू में ही छा गए करण सिंह त्यागी
फिल्म का निर्देशन किया है करण सिंह त्यागी ने—जो खुद एक वकील रह चुके हैं। शायद इसी वजह से कोर्टरूम सीन इतने रियल और प्रभावशाली लगे। डायलॉग्स, कैरेक्टर आर्क्स और रिसर्च वर्क—तीनों में शानदार संतुलन देखने को मिला।
फिल्म के अंत में कुछ फोटो और तथ्य दिखाए जाते हैं जो आपको अंदर तक झकझोर देते हैं। यह अनुभव केवल एक फिल्म नहीं, बल्कि एक एजुकेशनल-जस्टिस राइड बन जाती है।
फाइनल वर्डिक्ट: देखनी चाहिए या नहीं?
अगर आप एक पावरफुल, हार्ड-हिटिंग कोर्टरूम ड्रामा देखना चाहते हैं, जो आपको इतिहास की सबसे अंधेरी गलियों में ले जाकर झकझोर दे—तो ये फिल्म आपके लिए है।
👉 रेटिंग: 7.5/10
👉 टैगलाइन: "फॉरगेट एंटरटेनमेंट, ये फिल्म आपको सोचने पर मजबूर कर देगी।"
👉 नोट: बच्चों या फैमिली के साथ न देखें—ब्रूटलिटी और भाषा थोड़ी ज्यादा रियल है।

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